भगत सिंह की पुनः मूर्ति पूजा से सावधान!

फांसी के तख्ते पर जाने तक क्लारा जेटकिन लिखित कामरेड लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे भगत सिंह को एक बार फिर फांसी पर लटकाये जाने का खतरा देश के सामने पैदा हो गया है। यानि उसकी वैचारिक हत्या का खतरा। विगत कई-कई दशकों फिर पंद्रह साल पहले अन्ना हजारे और केजरीवाल की टीम द्वारा भगत सिंह, भगत सिंह की रट लगाई गई थी। भगत सिंह के दर्जनों लेखों और सैकड़ो पेज की जेल डायरी के विचारों से साफ-साफ बचते हुए, परहेज करते हुए।

(जेल डायरी तो इतनी खतरनाक है कि खुद भगत सिंह के सगे भाई कुलवीर के परिवार ने इसे साठ साल पूरे देश ही नहीं भगत सिंह के भांजे, बहन तक से सफलता पूर्वक छुपाया था। अब यह इंटरनेट पर ही उपलब्ध है जिसमें दर्जनों पुस्तकों के कोटेशन हैं।)

वैसे इस बारे में भगत सिंह के राजनीतिक गुरु लेनिन की मशहूर रचना राज्य और क्रांति के पहले अध्याय के पहले पृष्ठ का संदर्भ लेना दिलचस्प रहेगा। लेनिन कहते हैं, “मार्क्स की शिक्षा के साथ आज वही हो रहा है जो उत्पीड़ित वर्गों के मुक्ति संघर्ष में उनके नेताओं और क्रांतिकारी विचारकों की शिक्षाओं के साथ इतिहास में अक्सर हुआ है। उत्पीड़क वर्गों ने महान क्रांतिकारियों को उनके पूरे जीवन काल में लगातार यातनाएं दी, उनकी शिक्षा का अधिक से अधिक बर्बर द्वेष, अधिक से अधिक क्रोधोन्मत घृणा तथा झूठ बोलने और बदनाम करने के अधिक से अधिक अंधाधुंध मुहिम द्वारा स्वागत किया। लेकिन उनकी मौत के बाद उनकी क्रांतिकारी शिक्षा को सारहीन करके, उसकी क्रांतिकारी धार को कुंद करके, उसे भ्रष्ट करके उत्पीड़ित वर्गों बहलाने तथा धोखा देने के लिए उन्हें अहानिकारक देव प्रतिमाओं का रूप देने, यूं कहें उन्हें देवत्व प्रदान करने और उनके नाम को निश्चित गौरव प्रदान करने के प्रयत्न किए जाते हैं। मार्क्सवाद को इस तरह संसाधित करने में बुर्जुआ (पूंजीपति) वर्ग और मजदूर आंदोलन के अवसरवादियों के बीच आज सहमति है। “

ताजा-ताजा अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपके भी अपने दो साल पहले तक के (नौ साल) साथी केजरीवाल की तरह भगत सिंह का नाम ले रहे हैं। लेकिन भगत सिंह के मजदूर राज्य या समाजवाद लाने के सपने के बारे में क्या उन्होंने नौ सालों में अच्छी तरह पढ़ा है (या पढ़ने के बावजूद भी इसकी जानबूझकर उपेक्षा कर रहे हैं)?

केजरीवाल जी ने भी नहीं पढ़ा? इंडिया अगेंस्ट करप्शन के और दर्जनों युवा, प्रौढ़, बुड्ढे दोस्तों ने भी नहीं??

 किसान विरोधी ही नहीं, मजदूर, गरीब विरोधी तीन खेती कानूनों के खिलाफ कामरेड जोगेंद्र सिंह उग्राहा, का. दर्शनपाल जैसे खांटी मार्क्सवादी, लेनिनवादी संगठनों द्वारा शुरू किए गए और जुझारू ढंग से लड़े और जीते गए किसान आंदोलन को तो उन्होंने (बिना तफसील में जाये? जबकि सत्य तो ये है कि “डेविल लाइज इन डिटेल्स” ) याद किया, लेकिन मोदी सरकार द्वारा लागू चार श्रम कानूनो का जिक्र नहीं किया है।

ऐसे ही मानेसर-गुड़गांव से शुरू हुए और नोएडा-ग्रेटर नोएडा तक लड़े गये, फिर कर्नाटक की मजदूर विरोधी सरकार तक को कंपा देने वाले मजदूर आंदोलन के बारे में शायद ही उन्होंने कुछ कहा हो। एक और क्यों? आज भी जेल में बंद सत्यम वर्मा (जिन्होंने भगत सिंह की जेल डायरी को एडिट किया है), इंकलाबी मजदूर केंद्र के साथियों जैसे दर्जनों नेताओं को भी शायद याद नहीं किया? क्यों?? 

छह साल से कम्युनिस्ट होने, वो भी मुसलमान कम्युनिस्ट होने के अपराध में जेल में बंद कामरेड उमर खालिद का नाम तक नहीं लिया? 

क्या उन्होंने कई सालों से नैट पर उपलब्ध भगत सिंह की पूरी जेल डायरी पढ़ी है? क्यों नहीं पढ़ी??  क्या फांसी से तीन हफ्ते पहले के लेख ” क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा ” भी नहीं पढ़ा? भाई साहब! मुझे तो लगता है पढ़ा है बता नहीं रहे हैं। ये अकेला लेख ही पढ़ लेते तो वर्तमान पूंजीवादी जनतंत्र की बजाय जरूर समाजवाद या समाजवादी लोकतंत्र की बात करते।

(या फिर जैसा लेनिन कहते हैं वो केवल भगत सिंह के अवसरवादी मूर्ति पूजक हैं?) भगत सिंह जिस तरह से आजादी के बाद काले अंग्रेज के राज या पूंजीवादी जनतंत्र यानि टाटा बिरला राज (अंबानी अदानी राज) आने वाली बात देख लेते हैं। 

अभिजीत के ऊपर व्यक्तिगत रूप से ज्यादा बड़ा सवाल उठता है। क्योंकि उन दिनों अन्ना हजारे काले अंग्रेज-काले अंग्रेज की रट लगा रहे थे। काले अंग्रेज मतलब भारतीय पूंजीपतियों का की राज्य सत्ता। क्या भगत सिंह का साफ मानना नहीं था कि आजादी का आंदोलन भारतीय पूंजीपति वर्ग के धन और भोली-भाली व्यापक जनता के आंदोलन के सहारे चल रहा है? इसीलिए तो भगत सिंह कहते हैं हमें क्या फर्क पड़ेगा अगर अंग्रेज गवर्नर की जगह तेज बहादुर सप्रू आदि हमारे भाग्य विधाता हो जाएंगे? 

भगत सिंह ने तो अपने लेखों में गांधी पर भी सवाल उठा दिया था कि क्या गांधी जी कारखाने के मजदूरों से मिलते हैं या गाँव में किसानों के पास जाते हैं? ये भी कि गांधी को मजदूरों के पसीने से बदबू आती है?

भक्त लोग भ्रमित न हों इसलिए बता देना चाहिए कि ये सफेद झूठ है कि गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी रुकवाने को कुछ नहीं किया था। सच तो ये है कि एक नहीं पांच पत्र अंग्रेजों को लिखे। आखिरी पत्र तो ठीक फांसी वाले दिन ही अंग्रेजों को मिला।फासिस्ट भाजपा सरकार के कुप्रचार को धता बताने के लिए यह भी बता दिया जाए कि चंद्रशेखर आजाद के अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में होने की मुखबिरी वीरभद्र ने की थी ना कि जवाहरलाल नेहरू ने।

अभिजीत दीपके का क्या जिक्र करें तमाम प्रगतिशील, वामपंथी कहे जाने वाले लोग भी उस स्तर तक नहीं पहुंच चुके हैं जहां पर भगत सिंह अपनी जेल डायरी और लेखो के माध्यम से सौ साल पहले ही पहुंच चुके थे।

तो भगत सिंह, गांधी, अंबेडकर और संविधान की पंचमेल खिचड़ी भारत के युवाओं के सामने रखने वाले अभिजीत दीपके जी से अनुरोध है कि भगत सिंह की जेल डायरी पढ़ डालें, इस पर अपने विचार प्रकट करें। 

भगत सिंह के दो-तीन दर्जन प्रमुख लेखों पर अपने विचार प्रकट करें। हो सके तो सरकार (जिसमें संसद ही नहीं चीफ जस्टिस की पूरी न्यायपालिका भी आती है। तभी तो चीफ जस्टिस कॉकरोच बोले थे) जिसे राज्य सत्ता कहा जाता है उसके बारे में लेनिन के 11 जुलाई 1919 के स्वरदेलेव विश्व विद्यालय में दिये गए भाषण को भी पढ़ लें।

अंत में यह देखिए भगत सिंह जेल डायरी में क्या लिख रहे हैं।

 लेनिन को उद्धृत करते हुए भगत सिंह की जेल डायरी में उल्लेख है कि

“बुर्जुआ (यानि आज के देश दुनियां के पूंजीवादी) जनतन्त्र, सामन्तवाद की तुलना में, एक महान ऐतिहासिक प्रगति होने के बावजूद, एक बहुत ही सीमित, बहुत ही पाखण्डपूर्ण संस्था, धनिकों के लिए एक स्वर्ग और शोषितों एवं ग़रीबों के लिए एक जाल और छलावे के अलावा न तो कुछ है, और न ही हो सकता है।” 

—- भगत सिंह की जेल डायरी में लेनिन का उद्धरण

(डॉ उमेश चंदोला का लेख)

Leave a Reply